रांची न्यूज डेस्क: रांची से दिल्ली के लिए उड़ान भरने वाली एक एयर एंबुलेंस… एक ऐसी उड़ान जो किसी की जान बचाने के लिए थी, लेकिन वही सात जिंदगियों का आखिरी सफर बन गई। 23 फरवरी की शाम उड़ा बीच क्राफ्ट C90 किंग एयर कुछ ही देर बाद चतरा जिले के करमाटांड के पास जंगलों में गिरकर तबाह हो गया। विमान में दो पायलट, एक डॉक्टर, एक पैरामेडिक, दो अटेंडेंट और एक गंभीर मरीज सवार थे, कोई भी जीवित नहीं बच सका।
यह हादसा सिर्फ एक तकनीकी दुर्घटना नहीं, बल्कि सात परिवारों की बिखरी दुनिया की कहानी है। सबसे मार्मिक कथा है रांची सदर अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर विकास कुमार गुप्ता की। वे उस दिन मरीज को बेहतर इलाज के लिए दिल्ली ले जा रहे थे। उनके पिता बजरंगी प्रसाद ने रुंधे गले से बताया कि बेटे ने जाते समय कहा था—“मरीज को लेकर दिल्ली जा रहा हूं।” उन्हें क्या पता था कि वही आखिरी बातचीत होगी। खेत बेचकर बेटे को एमबीबीएस तक पढ़ाने वाले पिता के लिए यह वज्रपात से कम नहीं।
डॉक्टर विकास घर के इकलौते कमाने वाले थे। सात साल का बेटा अब भी शायद यह समझ नहीं पा रहा कि पिता अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। परिवार ने संघर्षों के बीच उन्हें पढ़ाया, बहनों की शादियां कराईं, और आज वही परिवार सहारे की तलाश में खड़ा है। दूसरी ओर मरीज संजय कुमार, जो ढाबा चलाते थे, आग में 65 प्रतिशत तक झुलस गए थे। परिवार ने कर्ज लेकर एयर एंबुलेंस का इंतजाम किया, ताकि दिल्ली में इलाज से जान बच सके। लेकिन इस उड़ान ने उनकी और उनकी पत्नी अर्चना देवी की जिंदगी छीन ली।
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ सिविल एवियशन (डीजीसीए) के मुताबिक विमान ने शाम 7:11 बजे उड़ान भरी थी और 7:34 बजे कोलकाता कंट्रोल से आखिरी संपर्क हुआ। इसके बाद वाराणसी से लगभग 100 समुद्री मील दक्षिण-पूर्व में रडार और संचार संपर्क टूट गया। जांच एजेंसियां अब इस सवाल का जवाब तलाश रही हैं कि आखिर जिंदगी बचाने निकली यह उड़ान मौत में कैसे बदल गई।