रांची न्यूज डेस्क: रांची में एलपीजी सप्लाई में आई दिक्कतों के बीच छोटे-छोटे खाने-पीने के ठेलों और दुकानों ने मजबूरी में कोयले के चूल्हों का सहारा लिया था, लेकिन अब यही अस्थायी समाधान कई दुकानदारों की स्थायी पसंद बनता जा रहा है। शहर के सैकड़ों छोटे रेस्टोरेंट और ढाबे अब एलपीजी की बजाय पारंपरिक चूल्हों पर खाना बनाने लगे हैं।
दुकानदारों का कहना है कि इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण लागत में भारी कमी है। पहले जहां एलपीजी सिलेंडर पर रोजाना अच्छा-खासा खर्च आता था, वहीं अब कोयले के इस्तेमाल से खर्च काफी कम हो गया है। एक दुकानदार के मुताबिक, पहले जहां रोज करीब 1900 रुपये ईंधन पर खर्च होते थे, अब वही काम करीब 500 रुपये में हो रहा है, जिससे रोजाना बड़ी बचत हो रही है।
हालांकि पारंपरिक चूल्हे पर खाना बनाना थोड़ा समय लेने वाला है, लेकिन कम लागत के चलते यह विकल्प ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है। कई दुकानदारों ने तो अपने यहां एलपीजी सिलेंडर हटाकर एक से ज्यादा कोयले के चूल्हे लगा लिए हैं। उनका मानना है कि मुनाफे के लिहाज से यह तरीका ज्यादा बेहतर है।
इस बदलाव का असर ग्राहकों पर भी देखने को मिल रहा है। कोयले पर बने खाने में आने वाली हल्की धुएं की खुशबू लोगों को पसंद आ रही है, जिससे ग्राहकों की संख्या भी बढ़ी है। वहीं बाजार में चूल्हों की मांग अचानक बढ़ गई है। छोटे घरेलू चूल्हों से लेकर बड़े व्यावसायिक चूल्हों तक की बिक्री तेजी से बढ़ी है, जिससे कारोबारियों को भी फायदा हो रहा है।